एक अबूझ पहेली...
एक अबूझ पहेली...
सवालों के घेरे में क्यूँ ?
जवाब देने वाले आ गए।
नींद तो आयी नहीं
न जाने क्यूँ ये
ख्वाब कटघरे में आ गए ??
तलाशते फिरते रहे हम
खुद अपनी ही नींद को
पर न जाने क्यूँ
हमारी तलाशी लेने
ये बीते गुज़रे लम्हे आ गए? ?
चले थे न जाने कौन सी
मन्ज़िलों की तलाश में
पर चलते चलते
ये जाने कहाँ आ गए हम।
क्यूँ भागते फिरते रहे हम
वो कौन सा गुनाह किया
कि आज अपने ही शहर में
यूँ मुँह छिपाते फिरते रहे हम ?
हवाओं में कुछ तो बदला है
वो पहले सा बेखौफ
अब कुछ भी नहीं लगता।
बीमारियाँ हवाओं में फैली हैं
या हवाएं खुद हुईं हैं ज़हरीली?
सवाल तो इतने हैं
पर जवाबों के ठिकाने
क्यूँ नहीं मिलते कहीं ?
उन जवाबों की तलाश में
यूँ ही दर दर भटकते
एक सीधी सरल ज़िंदगी
न जाने क्यूँ
एक दिन बन गयी
एक अबूझ पहेली
अनसुलझी सी।
