दुर्घटना वाली मौत पर
दुर्घटना वाली मौत पर
चार पैसे कमाते कमाते गई,
जान सस्ती थी सबको रूलाते गई,
सोचा जाऊंगा लौट जब घर को,
जख्म दूंगा नहीं किसी उम्र भर को।
मगर मौत पर बस मेरा न रहा,
शाम तो हुई मगर सबेरा न रहा।
घर से निकला ही था कमाई के लिए,
मौत बैठी थी मुझसे लड़ाई के लिए,
हार कर जब गले मैं उसके लगा,
छाती पे वार जरा कसके लगा।
सह सका न मैं दर्द रहा सका न जिंदा,
मौंत आई पिजड़ें से उड़ गया परिंदा।
