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Pujashree Mohapatra

Abstract

5.0  

Pujashree Mohapatra

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दुनियां

दुनियां

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ये दुनियां जितनी सुंदर है

उतनी ही उलझी हुई

कभी पुर्णिमा की चांद की

तरह लाजवाब

तो कभी लाखों कांटों से भरी

कहीं मोह है

तो कहीं छलावा

जितना भी समझ ने की

कोशिश करो

समझ में नहीं आता

ये जिवन का रहस्य

जैसे की दुनिया से

अनजान

एक शिशु के होंठों से छलकती

मुस्कान की तरह

यहां हर कदम पर

बिछी हुई है मायाजाल

ओर शिकारी बैठा है

अपने शिकार की तलाश में

फिर भी जीना है इन्सान को यहां

सारे दुःख और कष्ट को भुला के

इन हैवानों के भीड़ के बिच

इन्सान की तरह इन्सान बन कर।



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