STORYMIRROR

Pujashree Mohapatra

Abstract

4  

Pujashree Mohapatra

Abstract

रंग दे मोहे सखी

रंग दे मोहे सखी

1 min
251

कुछ ऐसे रंगों से रंग दे मोहे सखि 

कि ये रंग ना बदन से छूटे 


ऐसी लगन लागी उस मनमोहन से

कि वो प्रीत उससे तोड़े न टूटे


मन मोरा झुमे नाचे गाए आज मगन से

कि बरस के बाद आज होली है आई 


हया की गुलाल गालों पर लालि भर गई

जब मोरे कन्हैया ने मुझे रंग लगाई


मृदंग के ताल पर थिरकती पांव मोरा सखियों

सांसे महक रही प्रेम की सुगंध से


हरा नीला पीला गुलाबी सब रंग चढ़ गया

भंग का नशा चढ़ा जब नैन मिली मुरलीधर से 


खुशनुमा आज फ़िज़ा बसंत लाई है प्यार का बौछार

गली गली में शोर मची आई रंगों का त्योहार।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract