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मधुशिल्पी Shilpi Saxena

Abstract

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मधुशिल्पी Shilpi Saxena

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दरमियाँ

दरमियाँ

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हमारे दरमियाँ अब क्या बाकी है

प्यार की आग जाने कब की बुझ गई

नफ़रतों और तानों की बारिश भी थम गई

सूखा पड़ा है रिश्तों का दरख्त इस कदर कि

ख़ामोशियाँ भी खामोश हो गईं!


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