STORYMIRROR

Anju Garg

Tragedy

1  

Anju Garg

Tragedy

दर्द

दर्द

1 min
112

दर्द अश्क बन लम्हा लम्हा पिघलता गया

रूह से मेरी वो कतरा कतरा निकलता गया

सदियों से रिश्तों की डोर से बन्ध कर वो

मुसाफिर था जिस्म का साँसों की साज पर बजता गया।।

दर्द अश्क बन लम्हा लम्हा पिघलता गया।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Anju Garg

धारा

धारा

1 min पढ़ें

दर्द

दर्द

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Tragedy