Anju Garg
Tragedy
दर्द अश्क बन लम्हा लम्हा पिघलता गया
रूह से मेरी वो कतरा कतरा निकलता गया
सदियों से रिश्तों की डोर से बन्ध कर वो
मुसाफिर था जिस्म का साँसों की साज पर बजता गया।।
दर्द अश्क बन लम्हा लम्हा पिघलता गया।।
धारा
दर्द
न कोई मुझको प्रणाम करता मुझको न कोई स्मरण करता न कोई मुझको प्रणाम करता मुझको न कोई स्मरण करता
हम ज़रा घरेलू औरतें अपने पतियों की कविताएं उतने चाव से नहीं पढ़ती। हम ज़रा घरेलू औरतें अपने पतियों की कविताएं उतने चाव से नहीं पढ़ती।
बेवफा से वफ़ा करते हैं हम न जाने ये क्यों करते हैं। बेवफा से वफ़ा करते हैं हम न जाने ये क्यों करते हैं।
स्वीकार कर लिया है उसने, अब नियति के आघात को। स्वीकार कर लिया है उसने, अब नियति के आघात को।
कर्तव्य सिर्फ ससुराल के नहीं, सुकून आएगा जब, बेटी भी साम्ब सके बूढ़े माँ बाप को अपनी बाह कर्तव्य सिर्फ ससुराल के नहीं, सुकून आएगा जब, बेटी भी साम्ब सके बूढ़े माँ बाप क...
किसी सब्जी मंडी की तरह यहां शोर मच रहा था आजा भाई तुझे भी ले चलता हूं किसी सब्जी मंडी की तरह यहां शोर मच रहा था आजा भाई तुझे भी ले चलता हूं
मिल जाये गर अधिकार इन्हें, बादल ये तमस के हट जायें। मिल जाये गर अधिकार इन्हें, बादल ये तमस के हट जायें।
माना कि समाज में हावी हो रही है पुरुषवादी सोच इस सोच के खिलाफ आवाज उठाती तो क्या बात माना कि समाज में हावी हो रही है पुरुषवादी सोच इस सोच के खिलाफ आवाज उठाती तो ...
कैसे ही वो अपने दायरे बढ़ायेंगे, सोचते हैं, स्त्री का तो बस चरित्र ही नहीं कैसे ही वो अपने दायरे बढ़ायेंगे, सोचते हैं, स्त्री का तो बस चरित्र ही नहीं
जिंदगी से पहले कुछ भी नहीं था जिंदगी के बाद कुछ भी न होगा फारेहा जिंदगी से पहले कुछ भी नहीं था जिंदगी के बाद कुछ भी न होगा फारेहा
किरण बेदी न तो अच्छी बेटी ही बन जाने दो पंख खोलकर नील गगन में उड़ जाने दो किरण बेदी न तो अच्छी बेटी ही बन जाने दो पंख खोलकर नील गगन में उड़ जाने दो
नारी तेरी व्यथाओं का अंत नहीं है पर तेरी क्षमताएं भी तो अनंत है नारी तेरी व्यथाओं का अंत नहीं है पर तेरी क्षमताएं भी तो अनंत है
अब तो अपने ख़्वाबों की खुदकुशी कर ली है हालात की रस्सियों पर लटक कर। अब तो अपने ख़्वाबों की खुदकुशी कर ली है हालात की रस्सियों पर लटक कर।
क्यों पत्नी की मौत के बाद पति का पहनावा नहीं बदलता है ? क्यों पत्नी की मौत के बाद पति का पहनावा नहीं बदलता है ?
मैं कुछ पसीजा पल भर को सहमा भी जैसे पर मुझे तो उसे खाना खिलाना था! मैं कुछ पसीजा पल भर को सहमा भी जैसे पर मुझे तो उसे खाना खिलाना था!
हंसना तुम्हें यूं आया कैसे, लाज का पर्दा उठाया कैसे! हंसना तुम्हें यूं आया कैसे, लाज का पर्दा उठाया कैसे!
कोई मांग हो सूनी ,न ही बच्चे यतीम हों । और हर बहन की राखी को ,कलाई नसीब हो ।। कोई मांग हो सूनी ,न ही बच्चे यतीम हों । और हर बहन की राखी को ,कलाई नसीब हो ...
देश की अर्थव्यवस्था पहुंची रसातल, नारा बुलंद किया वोकल बने लोकल देश की अर्थव्यवस्था पहुंची रसातल, नारा बुलंद किया वोकल बने लोकल
मैं पानी हूँ। गर्भ से निकला, कुछ मीठा हुआ हूँ। मैं पानी हूँ। गर्भ से निकला, कुछ मीठा हुआ हूँ।
स्त्री चरित्र को बदनाम करता है उसे समाज में कुलटा कह कर हिकारत की नजरों से देखता है स्त्री चरित्र को बदनाम करता है उसे समाज में कुलटा कह कर हिकारत की नजरों से द...