STORYMIRROR

Sobhit Thakre

Abstract

4  

Sobhit Thakre

Abstract

दोपहर की धूप

दोपहर की धूप

1 min
407

दोपहर की धूप 

जिसने ओढ़ रखी थी चादर

अपने ही गमों की 

कभी कराहता

कभी हुंकार भरता 

फिर दूर क्षितिज

में लालिमा लिए 

अस्त हो जाता 

सांझ को इंतजार

करता हुआ 

एक -एक क्षण 

तड़पता 

फिर डूब जाता

अपने ही गमों में 

मध्य रात्रि के

एकांत में 

शिकायत करता

न्याय मांगता 

अपनी ही सांसों से 

टूट कर भोर में 

आंसू लिए सो जाता

दोपहर की धूप के लिए ।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract