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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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दोहरा वजूद

दोहरा वजूद

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दोहरे वजूद को जीती रही

हर बार अपने ही लब सीती रही

मुझे ललकारता मेरा ही मौन

अकसर प्रश्न उछालता मै कौन


हिरणी सी यहाँ वहाँ भागती रही

पता नहीं क्या तलाशती रही 

उम्र गुजरती रही

बेचैनी बढ़ती रही

आखिर एक दिन छिड़ी मन से मन की जंग


जिसे सुन मै भी रह गई दंग

फिर खुद के लिए बनाईं एक सीमा रेखा

कुछ भी हो जाए खुद को नहीं करना अनदेखा

मेरी भी अपनी एक जिंदगी है 

करनी उसकी भी बन्दगी है


जीना है मुझे और आगे बढ़ना है

अपनी हस्तरेखा को खुद ही गढ़ना है

इस सोच से ही स्फूर्ति छा गई

और जिंदगी मेरी मेरे करीब आ गई।


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