दोहा छंद
दोहा छंद
विधा-दोहा छंद
शीर्षक-शब्द
कहते मुझको शब्द सब, होते मुझमें भाव।
भाँति-भाँति हैं रूप मम, करो नेक बर्ताव।।
अक्षर-अक्षर मिल सदा, बनते शब्द अनेक।
शब्द-शब्द मिल वाक्य बन, सबको करता एक।।
सभी भाव के वाक्य बन, बनूँ पुस्तक खास।
नेक राह दिखला सकूँ, रहता सदा प्रयास।।
कहलाते वे शब्द हैं, प्रेम-स्नेह सत्धर्म।
परहित का हो काज यदि, वही बनें सत्कर्म।।
दूसरों को जो कष्ट दें, कहते उनको दुष्ट।
इसीलिए निज मानकर, करें नहीं अब रुष्ट।।
बनते इससे ही अमृत, या विष धरता रूप।
सुख-दुख मुझमें ही सदा, कहीं छाँव या धूप।।
मुझसे ही है गीत सब, बनें सभी संगीत।
महाकाव्य मैं बनकर, धर्म निभाऊँ रीत।।
उत्तम रहता शब्द जब, उसमें ही भगवान।
कहें सुधा मृदु शब्द नित, शब्दों का रख मान।।
