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गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

Abstract

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गुलशन खम्हारी प्रद्युम्न

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दोहा छंद..

दोहा छंद..

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"जननी जनती बाल को, गर्भ धरे नव माह ।

तू भी मेरा अंश है, कैसे करूं मैं आह ।।"


"ऑंसू सारे बह गए, जैसे सरिता सोख ।

तुझ बिन सूना सब यहाॅं, सूनी है मम कोख ।।"


"आंखें तरसे देख तो, देख रही है राह ।

ढूंढते तुझे हर गली, मुझको तेरी चाह ।।"



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