दो मुलाक़ात....!
दो मुलाक़ात....!
दिन का चार पहर लग गया
तूफ़ानो का क़हर लग गया,
गाँव का हर नहर लग गया
नदियों का लहर लग गया,
दो मुलाकात क्या हुई हमारी तुम्हारी,
निगरानी में सारा शहर लग गया।
जिस्म को मेरे जुदाई का ज़हर लग गया,
जान ले डूबेगा इश्क़ का ऐसा भंवर लग गया
अपनी चाहत को ये कैसी नज़र लग गई,
दो मुलाकात क्या हुई हमारी तुम्हारी
निगरानी में सारा शहर लग गया।

