दलदल...
दलदल...
सोच अगर निम्नस्तरीय हो,
किसी भी मनुष्य मात्र में
इंसानियत असंतुलित होने में
ज़्यादा वक्त नहीं लगता।
इस प्रतिस्पर्धा भरी भीड़ में
अनैतिकता की तरफ प्रायः
कुछ लोगों का झुकाव
होना लाज़मी है...
मगर फिर भी
ज़िन्दगी आपको
स्वयं को सुधारने का
एक मौक़ा
ज़रूर देती है...!
ये आप पर निर्भर करता है
कि आप कैसे लोगों से
अपना मेलजोल बढ़ाएँ
और कैसे सोचविचार वाले
लोगों से पूर्णतया
किनारा करें...!
अगर आप को
असामाजिक दलदल में
धंसते जाना है...,
तो ये आपका विचार्य विषयवस्तु है,
जिस पर आप को ही
स्वाधीन भाव से निर्णय लेना है...
एक इल्तिज़ा है बस,
आप में से कोई भी
दलदल में न फंसें...
सजग रहें!!! सुरक्षित रहें!!!
