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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy Inspirational

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Drama Tragedy Inspirational

दिन रहे चार

दिन रहे चार

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तेरे जीवन के दिन बचे हुए है, अब चार

जी ले जिंदगी मत ले, तू हृदय पर भार

ज्यादा भार से डूब जायेगा, तेरा संसार

जो मिला है, उसमे मान ईश्वर उपकार


मत ले व्यर्थ की चिंताओं की तलवार

समय से पहले देगी तुझको, मौत यार

उच्च रक्तचाप का हो जायेगा, शिकार

छोड़ चिंता, कर भजन त्याग दे, अहंकार


क्या लाया, क्या खोया, तू धन बेशुमार

खाली आया, खाली जायेगा, ये स्वीकार

मेरा-मेरा न कर, छोड़ दे, ऐसा व्यवहार

मन के कहे न चल, थोड़ा कर विचार


कल क्या होगा, भूतकाल में क्या हुआ,

इस चिंतन में अपने वर्तमान को न मार

मन गर संतुष्ट न, तो स्वर्ण भी शूल हार

मन पुष्ट माटी भी देगी, मां जैसा प्यार


यदि भीतर मृत पड़ी आत्मा पुकार

फिर तुझसा बदनसीब न कलमकार

भीतर आत्मा पर कर जोरदार प्रहार

तेरे जीवन के दिन बचे हुए है, अब चार


तू अकेला आया, अकेला ही जायेगा

मत गुरुर कर, धन-दौलत, पुत्र, पुत्री, नार

क्या सेठ, क्या दीन सबकी बराबर राख

लोग यूँही करते, झूठ जाल का कारोबार


खुद को लगा हनुमत भक्ति में, बारंबार

तेरा क्या, तेरी सात पुश्तों का होगा उद्धार

जैसे, प्रह्लाद ने किया अपने कुल का उद्धार

तू भी कर भक्ति, होगा नित अदृश्य चमत्कार


भक्ति की शक्ति को ऐसा मिला, उपहार

पत्थर से भी एकदिन आयेगी, झनकार

तेरे जीवन के दिन बचे हुए है, अब चार

अब तो जाग पथिक, बुढ़ापा बहुत, बेकार


जो प्रत्येक कर्म इष्टदेव को समर्पित कर,

मन को भक्ति साबुन से निर्मल करे, बारंबार

उससे मिट जाते शनै-शनै: षडरिपु विकार

अंत मे, वो बिना प्रयास भवसागर होता, पार।


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