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Nitu Rathore Rathore

Romance

4  

Nitu Rathore Rathore

Romance

****दिले बेताब****

****दिले बेताब****

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दर्द को शूल-ए-जिगर बनके निकल जाने की

या कहूँ ज़ख़्मो को गहराई में ढल जाने की।


रात भर दिल से निकलता ही होगा लहू मेरे

खुद ही गिरकर के जरा खुद संभल जाने की।


तेरा एहसास है होठों पर फ़रियाद बनके

उसे इजाज़त नहीं दी मैंने फ़िसल जाने की।


वादियों फिर से तू आबाद मेरी करने चला

काँटे बोकर न करो बात संभल जाने की।


हाँ तेरी यादों में अक्सर ही खोए रहते हैं

शौक़े-उल्फ़त है हया, हाय बहल जाने की।


क्यों मोहब्बत में डूबी जान धोखा खाकर ये

दिले बेताब को आदत है मचल जाने की।


लौट के चाँद न आया न उदासी उसकी

बात करते हो सूरज से "नीतू"जल जाने की।



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