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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

दिल को समझा दिया करूंगा

दिल को समझा दिया करूंगा

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कभी मैं बात नहीं करुंगा,

दिल को समझा दिया करुंगा,

मोहब्बत खुदा नहीं तवज्जो,

गम अदायगी पे सजदा करुंगा।


अक्सर कोई समझ पाया हो,

प्यार में शर्तों का नशा छाया हो।

ऐसा प्यार सजदा नहीं करता,

अपनों से दूर कोई नहीं करता।


रुह का नशा जज्बात-ए-होश हो,

शर्तों पर देखा खुदा भी बेहोश हो,

फिर आदमी क्या मजाल करता,

शर्तों से खुदा भी घबराया करता।


प्यार जो अपने बांटें वो प्यार कहलाता है,

गली गुलिस्ताँ में मिलना खेल कहलाता है।

दो लोगों की चाहत अपनों से दूर ले जाती है,

वो प्यार परिवार समाज खण्डन कहलाता है।


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