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Sajida Akram

Abstract

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Sajida Akram

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"दीया"

"दीया"

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 दीया, 

आज मुझ बेजान सी माटी को दिया 

एक कुम्हार के मेहनतकश हाथों, 

 ने दीये का सुन्दर रुप, 

मुझको भट्टी में पका कर किया, 

मज़बूत फिर किया मुझ पर, 

रंग-रोगन जब मैं बना छैल-छबीला, 

"दीया"

 अब कुम्हारन चली सजा कर, 

अपनी टोकरी में जब हाट-बाज़ार, 

में आए ख़रीददार कुम्हारन ने बताया, 

मेरा दीया सबसे मज़बूत आप ले लो, 

बाबूजी ये जगमग कर देगा आपकी, 

आलिशान कोठी में होगी दीपावली, 

भी जगमगाते दीयों से रोशन होगी |

दीया भी इठलाया सोच कर, 

मुझमें है अंधेरे को हरा देने की 

क्षमता, मुझमें है भटको को , 

राह दिखाने और राह रोशन, 

कर देने की क्षमता मैं एक नन्हा

"दीया"...


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