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Piyosh Ggoel

Abstract Tragedy

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Piyosh Ggoel

Abstract Tragedy

दीवाली कैसे मनाऊँ ?

दीवाली कैसे मनाऊँ ?

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बाज़ार में बहुत ज्यादा भीड़ लगी हुई थी, किसी को पैर रखने की भी जगह आज बाज़ार में नहीं मिल रही थी, दुकाने फुटपाथ तक आ गई थी, बड़े बड़े मॉल रंग बिरंगी चुन्नियों से सजे हुए थे। हलवाई की दुकान पर, कपड़ो की दुकान पर, ज्वैलरी की दुकान पर और खिलौनों की दुकान पर भीड़ ही भीड़ नज़र आ रही थी। यह भीड़ थी उन लोगो की जो दीवाली के लिए घर के लिए खरीददारी करने आए थे। इसी भीड़ में एक थी सपना जो अपने बच्चों के लिए दीवाली पर नए कपड़े खरीदने "शर्मा दुकान " पर आई थी। सपना के कहने पर दुकानदार ने सपना को लाल और नीले रंग की शर्ट दिखाई और पूछने पर बताया कि इस शर्ट की कीमत 850 रुपये है । शर्ट की कीमत सुनकर सपना को गुस्सा आ गया, अब एक मध्य वर्गीय परिवार की औरत 850 रुपये एक शर्ट पर खर्च करने से पहले हिचकिचाएगी ही। खैर, मोल तोल करने के बाद भी जब दुकानदार नहीं माना तब सपना वापस आ गई।

सपना का पति अनुज रात को अपने घर वापस आया और जब उसे यह सारी बात पता चली तब वह बोला कि अगर तुम्हें वह शर्ट पसन्द थी तो ले ही लेती, तुम्हे कितनी बर्फ कहा है कि पैसों के बारे मे मत सोचा करो। सपना ने अपने पति की बात सुन तो ली लेकिन सपना भी अपने मन मे जानती थी कि अनुज सिर्फ अपनी पत्नी का दिल रखने के लिए ऐसा कह रहा है। सपना के जाने के बाद अनुज अपने मन मे सोचने लगा कि क्या मैं अपनी परिवार को एक 850 रुपये की शर्ट भी नहीं दिला पाया ?

अनुज अपने मन के भावो के साथ लड़ ही रहा होता है तभी अनुज का बेटा अक्षत अनुज के पास आता है और कहता है - "पापा ! इस बार मुझे महंगे वाली पटाखों वाली बन्दूक चाहिए, लगभग 700 की आएगी, पैसे दो न "। अक्षत की बात सुनकर अनुज थोड़ा सा घबरा गया, वो सोचने लगा कि अब तक तो दीवाली की मिठाई के लिए भी पैसों की कमी पड़ रही है, इसे 700 वाली बन्दूक कैसे दिलाऊ ? अपने मन के भावों को मन मे ही छुपाते हुए अनुज ने अक्षत से कहा - " बेटा ! इस बार नहीं, अगली बार लेंगे, इस बार वातावरण के लिए हम बन्दूक से पटाखे नहीं फोड़ेंगे "। अपने पिता की बात सुनकर अक्षत उदास होकर अपने कमरे में चला गया। अनुज सोचने लगा कि इस दीवाली मैं अपने बच्चे को खुशी भी नहीं दे सकूंगा।

अपना ध्यान भटकाने के लिए अनुज ने टी वी चालू किया, उसमे उसने देखा कि दक बहुत बड़े उद्योगपति ने दीवाली पर अपने बंगले को लगभग 45000 खर्चे से सजाया है और एक उद्योगपति ने इस दीवाली गरीबो को कपड़े, पटाखे देने का एलान किया है। अनुज सोचने लगा कि गरीबो और अमीरों की दीवाली तो हो गई पर मध्य वर्गीय परिवार दीवाली कैसे बनाये ? खुशियों के त्यौहार पर क्यों अक्सर हम मध्य वर्गीय परिवारों को खुशियों स ज्यादा अपने खर्चो की फिक्र होती है ?


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