दीपावली
दीपावली
उमंग उत्साह का प्यार स्नेह का,
स्वच्छ हरियाली युक्त धरा पर,
जब जब ईश्वर ने अवतार लिया,
तब तब अधर्म पर धर्म की विजय हुई,
मिला वनवास दिया वचन,
करने उसको पूरा निकले,
राम संग लक्ष्मण और सीता,
भटके वन वन में नंगे पैरो में छाले पड़े,
ये कैसी लीला रची कुदरत ने,
जो भगवान को इतना कष्ट भोगना पड़ा,
लगा श्राप दशरथ को विरह से तडोपोगे,
बेटे के दुख में अपने प्राणो को छोड़ दोगे,
वहीं कर्म बना भाग्य और भोग रहा पूरा संसार,
अयोध्या राम बिना सुनी सुनी जैसे आत्मा बिन शरीर,
हुए चौदह बरस पूरे अयोध्या फिर से सजी,
गूंजी फिर से लहरें उमंग की उत्साह की,
क्योंकि हुआ वचन पूरा और राम सीता लक्ष्मण आए,
तब से दीपावली का शुभ दिन उस दिन बनाते हैं,
दीपों से अपने घर अंगने को सजाते हैं,
मिठाइयां बांट खुशियों की बहारें लगाते हैं,
सब मिलजुलकर यह दीवाली का पर्व बनाते हैं।
