STORYMIRROR

Neelam Chawla

Abstract

3  

Neelam Chawla

Abstract

धुंधला सा वो

धुंधला सा वो

1 min
447

मैंने दीवालों की दरारो में झाँका 

कही कुछ टुकड़ा पड़ा मिल जाए

मैंने टूटे काँच के टुकड़ो में ढूँढा 


की कोई बिखरी रेखा मिल जाए

चमकते फर्श में घंटो अपने 

माथे को निहारा की कुछ दिख जाए


पर सब समतल और समान दिखता है 

पानी की लहर सा मचलता नहीं कुछ

खामोश सी ज़ुबान उसकी ..कुछ कहता है


सुनाई नहीं देता, मगर किसी को

बस बुलबुले सा बुदबुदाता है

और धीरे से कान में

कुछ कहकर, फट जाता है।


कोई बड़ी से ताक़त जो हज़ार 

पर्दो के पीछे छुपी है मगर 

कभी धुंधली से दिखती भी है और 

नहीं भी।


अजीब सा कर दिया उसने खेल 

तन को कहीं से ढका नहीं और 

मन खुला रखा नहीं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract