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Brijlala Rohanअन्वेषी

Abstract

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Brijlala Rohanअन्वेषी

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दहशत में सिसकती आवाज

दहशत में सिसकती आवाज

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न कहीं घर-बार है मेरा, न कोई ठर- ठिकाना है।

हाल क्या बताऊँ मैं अपनी अब ऐसा लगता है कि

घूंट -घूंट कर ही दहशत में ही जिंदगी बिताना है !

बस अपने अस्तित्व को बचाये रखना ही

अब मेरे जीवन का बन गया एक बहाना है।


हां ! मैं वही आतंक और भय के बीच रहने वाला 

एक शरणार्थी हूँ, जो दर- दर मारा फिर रहा हूँ ।

कभी इस सीमा से खदेड़ा जाता हूँ,

कभी उस सीमा पर रोका जाता हूँ।


न कोई मेरी अपनी अल्फाज है , न कहीं कोई मेरी आवाज़,

बस! बेबस, असहाय शरणार्थी का सर चढ़ा सरताज !

 आखिर मेरी गुनाह क्या है? कोई बताएगा भी मुझे ?

क्या सिर्फ इतना कि मैं ख़ून से सनी माटी में जन्म लिया

या मैं अपनी हक के लिए लड़ रहे हैं ?


 जो उन दरिंदो को रास न आया ।

गर नहीं तो क्या खता है मेरी ? कोई मुझे समझाए

क्यों मुझे अमन - चैन से जीने नहीं दिया जाता ?

क्यों मुझे इतना सताया जाता ?

आख़िर कब तक मैं यूँ ही अनाथ मुसाफिरों की तरह भटकता रहूँ ?


कब तक मैं यूँ ही अखबारों के पन्नों और औपचारिक

सम्मेलनों का महज़ चर्चा बिंदु बनकर रह जाऊं ?

क्या मैं कभी स्वतंत्र और सुकून भरा जिंदगी जीते हुए खुद को देख पाएंगे ?

कोई तो दहशत में सिसकती आवाज को सुनो।


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