दहशत में सिसकती आवाज
दहशत में सिसकती आवाज
न कहीं घर-बार है मेरा, न कोई ठर- ठिकाना है।
हाल क्या बताऊँ मैं अपनी अब ऐसा लगता है कि
घूंट -घूंट कर ही दहशत में ही जिंदगी बिताना है !
बस अपने अस्तित्व को बचाये रखना ही
अब मेरे जीवन का बन गया एक बहाना है।
हां ! मैं वही आतंक और भय के बीच रहने वाला
एक शरणार्थी हूँ, जो दर- दर मारा फिर रहा हूँ ।
कभी इस सीमा से खदेड़ा जाता हूँ,
कभी उस सीमा पर रोका जाता हूँ।
न कोई मेरी अपनी अल्फाज है , न कहीं कोई मेरी आवाज़,
बस! बेबस, असहाय शरणार्थी का सर चढ़ा सरताज !
आखिर मेरी गुनाह क्या है? कोई बताएगा भी मुझे ?
क्या सिर्फ इतना कि मैं ख़ून से सनी माटी में जन्म लिया
या मैं अपनी हक के लिए लड़ रहे हैं ?
जो उन दरिंदो को रास न आया ।
गर नहीं तो क्या खता है मेरी ? कोई मुझे समझाए
क्यों मुझे अमन - चैन से जीने नहीं दिया जाता ?
क्यों मुझे इतना सताया जाता ?
आख़िर कब तक मैं यूँ ही अनाथ मुसाफिरों की तरह भटकता रहूँ ?
कब तक मैं यूँ ही अखबारों के पन्नों और औपचारिक
सम्मेलनों का महज़ चर्चा बिंदु बनकर रह जाऊं ?
क्या मैं कभी स्वतंत्र और सुकून भरा जिंदगी जीते हुए खुद को देख पाएंगे ?
कोई तो दहशत में सिसकती आवाज को सुनो।
