धरती-माँ, बाप -आसमान
धरती-माँ, बाप -आसमान
भूख लगेगी तो माँ है, डर लगेगा तो बाप है
फिर क्यों, दूसरे की थाली देखकर
तेरे मन की तख्ती पर डोलते ये टेढ़े -मेढ़े सांप है
मत ठहर ना सुबक यूं ना तू सिसक, की
निरंतर जाप से बना अपनी ऐसी छाप भरसक की
खुद सिंह भी आकर पीठ थपथपाये भाप तेरी छाप की माप
दहकता ताप तेरा, स्वरुप तेरा प्रताप है,
फिर भी सुख -दुःख के इस मायाजाल में
गर तेरे हिस्से संताप है तो
हे सखी ! इसकी वजह-मूल, इस उलझन का हल
इस अबूझ पहेली की एकमात्र सुलझन स्वयं आप है।
