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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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देव दानव

देव दानव

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देव-दानव ********* यही तो कलयुग की माया है  सभी देव हैं और दानव भी, पर विडंबना यह कि पहचान का संकट है। दानवों को तो हम पहचान सकते हैं  पर देवों को पहचान पाना मुश्किल है  पहचान भी लें, तो विश्वास करना कठिन है, झिझक और डर भी लगता है क्योंकि इन्हीं देवों और दानवों के बीच हमें जीना भी होता है। उम्मीदों के आसमान को ऊँचा रखना पड़ता है फूँक-फूँककर कदम रखना होता है, राह के देव-दानवों से बचकर चलना पड़ता है। क्योंकि देव कब दानव और दानव कब देव बन जाए कहना बहुत मुश्किल होता है, बस! इसी ऊहापोह में आगे बढ़ना भी होता है। देव हों या दानव, सबसे रिश्ता रखना ही पड़ता है, क्योंकि कौन कब काम आ जाए हमारे  समय से पहले इसका पता भी तो नहीं होता है, इसीलिए देव हो या दानव दोनों के महिमा मंडन से बचना पड़ता है, जीने के लिए बार-बार मरना तक पड़ता है  सुधीर श्रीवास्तव 


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