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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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दोहा

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दोहा - कहें सुधीर कविराय  ******* सतगुरु  ******* अपना  कोई  है  नहीं,    आप  लीजिए  जान। केवल सतगुरु आपका, यही आज का ज्ञान।।  समझ नहीं यदि आ रहा, करिए आप विचार।  सकल सृष्टि आधार है, सतगुरु पद आधार।।  ******* जय माता दी  ******* भक्तों  की  विनती  सुनो, मैया  दो  वरदान। सुख-समृद्धि संग में,    मानवता  पहचान।। बस  इतनी  सी  चाह  है,   मैया  दो  वरदान। निंदा -नफरत से सदा, मुक्त जगत पहचान।। मैया  दो  वरदान  ये,    रुके  फैलता  युद्ध। अहम सभी का दूर हो, बड़ी जरुरत बुद्ध।। मैया  दो  वरदान  अब,     माँग  रहे  हम  आज। सबके हित का हम करें, मिल-जुल सारे काज।। मन  में  पावनता  रहे,   मैया  दो  वरदान। एक सूत्र में जगत का, बंधन बने विधान।। करूँ नित्य आराधना, थोड़ा तो दो ध्यान। पूजन -पाठन ज्ञान का, मैया दो वरदान।। देवी   की   आराधना,     करते   पूजा  पाठ। जन-मन जो भी भक्ति से, खुलती उसकी गाँठ।। सजा हुआ दरबार है, चहुँदिश माँ का आज। लगती भारी भीड़ है, जान  रहे  सब  राज।। आदिशक्ति का देखिए, जन-जन करते भक्ति। बढ़ जाती नवरात्रि में,  मातृ  चरण आशक्ति।। मैया जगदम्बे सुनो, मेरी  तनिक  पुकार। सारा जग बैरी हुआ, आप मुझे दो तार।। जगदंबा का  हो  रहा, चहुँदिश  में  गुणगान। धूप-दीप संग आरती, मातु कृपा सब मान।। भक्ति-भाव जन-मन करे, मैया  का सत्कार। जगदंबे  करिए  कृपा,     हो  जाए  उद्धार।। ममता चादर ओढ़नी, सजा मातु दरबार। जन  मानस  है मानता, जगदंबे  संसार।। माँ जगदम्बे की बड़ी, लीला अपरम्पार। पापी को दंडित करें, भक्तों को दे तार।। ******* विविध  ******* जिसका जैसा आचरण, वैसी उसकी सोच। दुविधा जिसके हृदय में, देते  वही खरोच।। निज चरित्र की आड़ में, नहीं कीजिए दंभ। आप जानिए समय को, नित नूतन आरंभ।। बिगड़ गया है आजकल, लोगों का बर्ताव। इसीलिए तो बढ़ रहा, घर-घर में बिखराव।। चाल चलन ऐसा रहे, जिस पर सबको नाज। यही जरुरत आपकी,  सबसे  पहले  आज।। अपने निज व्यवहार से, लो मन सबका जीत। सदा  रहोगे  हृदय  में, सबके मन  का  मीत।। हर मुश्किल आसान हो, कभी न मानो हार। आप नहीं यदि ठानिए, नाहक  में  ही  रार।। कभी न माने हार जो, मिलती उसको जीत। जिसकी होती स्वयं से, केवल विजयी प्रीत।। आती जब मुश्किल घड़ी, तब ही खुलते नैन। उससे  पहले  हम  सभी, सोते हैं सुख  चैन।। आता जब मुश्किल समय, दुनिया देती सीख। जिन पर हमको गर्व था,   वही नहीं दें भीख।। आता जब मुश्किल समय, सब हो जाते दूर। बिना कहे ही कह रहे, हम  भी  हैं  मजबूर।। बैल सरीखी जिन्दगी, जीते हम सब आज। कलयुग के इस दौर में, यही राम का राज।। अब  गाँवों  में  भी  नहीं, दिखते  द्वारे  बैल। इसीलिए क्या मनुज के, मन में बढ़ता मैल।। कौन  लक्ष्य के  पास है, और कौन  है दूर। जो खुद से कहता नहीं, वो तो है मजबूर।। मिले न जब तक लक्ष्य तो, करते रहें प्रयास। बैठे  ठाले  व्यर्थ  ही,     झूठी  होगी  आस।। लक्ष्य आपके सामने, आगे बढ़िए आप। भाव हृदय में सफलता, रखें दूर संताप।। चमक  आपके  नाम  की, कर्मों  के  आधीन। नाहक ही क्यों व्यर्थ में, कहते खुद को दीन।। बच्चे यदि लायक हुए, तो चमका दें नाम। वरना ईश्वर की कृपा, नहीं हुए बदनाम।। माता पिता की पूजिए, ईश मानकर आप। बस इनकी आराधना, करें सदा निष्पाप।। निंदा नफ़रत भूलकर, करो इबादत आप। हम भी करें उपासना, व्यर्थ छोड़ संताप।। ईद पर्व  पर  भर  गया, आज  इबादत  गाह। हिंदू मुस्लिम बीच में, दिखा मिलन उत्साह।। अपने-अपने धर्म का, करिए पूजा-पाठ। हम करते आराधना, नहीं डालिए काठ।। मातु पिता  हैं  चाहते, बनिए  आप  सशक्त। लोभ लालसा मुक्त हों,  रहें  कर्म  आशक्त।। तन-मन-धन से तो सदा, बनिए आप सशक्त। प्रेम-प्यार  संवेदना,      कर्म-धर्म  के  भक्त।। शंकित मन से भी कभी, हो जाता है घाव। बिन पानी भी डूबती, नाहक अपनी नाव।। मन शंकित यदि आप का, करिए आप विचार। आपस  में  संवाद  से, मिले  उचित  आधार।। जिसने ये जीवन दिया,  और  संग  पहचान। मात-पिता को ईश सम, सदा दीजिए मान।। आए  हो  इस  जगत  में, आप करो  स्वीकार। जिसने ये जीवन दिया, उसका भी अधिकार।। औरों का तू छोड़कर, दामन ख़ुद का देख। अपना भी तो देख ले,नाहक बनता शेख।। दामन ख़ुद का देख लो, कितना पाक पवित्र। बाद  खींच  लेना  कभी, मेरा  पावन  चित्र।। क्यों  करते  हो  व्यर्थ  में, तुम  इतना अभिमान। दामन ख़ुद का देख लो, फिर गाओ निज गान।। भला युद्ध से कब मिला, कभी सुखद परिणाम। कूटनीति -संवाद  ही,  सरल   सहज  आयाम।। जनता में डर बढ़ रहा, संकट में है जान। शान्ति सभी हैं चाहते, दीन धर्म ईमान।।       नेताओं में अब कहाँ, दिखता सेवा भाव। अपने मद अनुरूप ही, देते  रहते  घाव।।        जन-धन  के  नुक़सान  से, दुनिया  है  हैरान। पर कुछ लोगों का अहम, बन आया शैतान।।   तेल नीति टकराव से, जन-मन है गमगीन। बेबस  मानवता  हुई,    बन  बेचारी  दीन।। बना  रहे  परिवार  का,    मर्यादा   सम्मान। यही सोच भारी पड़ी, व्यर्थ गया बलिदान।। रिश्ता  फलता  है  वही, जहाँ  प्रेम  विश्वास। आपस में जिनमें रहे, अधिकारों की आस।। रिश्ता फलता है वही, जिसमें मधुरिम भाव। जहाँ स्वार्थ की ओट में, नहीं  डराए  घाव ।। इक दूजे की भावना, और  उचित  सम्मान। रिश्ता फलता है वही,   हो सबको ये ज्ञान।। कफ़न बाँधकर  आइए, करना  है  बलिदान। यही समय की माँग है, व्यर्थ छोड़ अभिमान।। मंगलमय नववर्ष हो, कृपा करो प्रभु राम। जो अतीत में कष्ट था, भूल  रचें  आयाम।।  भक्ति, शक्ति, विश्वास का, अद्भुत है गठजोड़। व्यर्थ समय मत कीजिए, नहीं  मिलेगा  तोड़।। खुशी संग जीवन सदा, जीते रहिए आप। समदर्शी निज भाव से,  मिटे शोक संताप।। सुधीर श्रीवास्तव  


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