सरसी छंद -अभिमान
सरसी छंद -अभिमान
सरसी छंद (१६,११) -अभिभान काहे इतना करता है तू, भला मनुज अभिमान। जान-बूझ नादान बना क्यों, या सचमुच अंजान।। बड़े-बड़ों को देखा तूने, हुआ है क्या अंजाम। या इसको तू मान रहा है, सभी हुए नाकाम।। निंदा -नफरत भूलो प्यारे, गाओ सुंदर गीत। अपना भी कुछ मान बढ़ाओ, बनो सभी के मीत।। धन-दौलत का नहीं ठिकाना, आज पास कल दूर। कौन जानता कल में तुम ही, हो जाओ मजबूर।। आज खुदा खुद बने हुए हो, नहीं दे रहे भाव। क्यों ऐसा तुम सोच रहे हो, नहीं भोगना घाव।। सीमा से बाहर मत जाओ, मुफ्त दे रहा सीख। ऐसा भी तो हो सकता है, कल तुम माँगो भीख।। छोड़ दंभ अभिमान अभी तू, समझ लें जीवन मर्म। वरना भारी पड़ जायेगा, करता जैसा कर्म।। कोई साथ नहीं कल देगा, सोच समझ लोआज। जय-जयकार आज जो करते, झूठा इनका नाज।। समय साथ जब कल ना देगा, पीटोगे निज माथ। कोई खड़ा नहीं तब होगा, देने तेरा साथ।। सुधीर श्रीवास्तव
