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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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दोहा

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दोहा -कहें सुधीर कविराय  ********* श्रद्धांजलि/श्रद्धासुमन  ********* सदा शिकायत जो रही, वही  मुझे  है आज। छोड़ अधर में क्यों गए, इतना सारा काज।। सूक्ष्म रूप में ही सही, रखें शीश पर हाथ। बस इतनी सी चाह है,  रहें  हमारे  साथ।। ********* विविध  ********* करो  भरोसा  ईश  का, चाहे  जैसे  आप। सदा नाम उनका करें, सोते-जगते आप।।    मूर्खों का बाजार है, मालिक होगा कौन।  भैया बाबू हैं सभी, आखिर बोलो कौन।। कद-पद तो है बाद में, पहले हम इंसान। दंभी बनिए मत कभी, देना सीखो मान।। कर्म-धर्म के साथ ही, खुद को भी ले जान। ज्ञानी  विज्ञानी  सही,  पहले  हम  इंसान।। बहुत याद आता हमें, सदा आपका साथ। सूना-सूना शीश है, कौन रखे  अब हाथ।। बहुत याद आती हमें, मिली  आपसे  मार। तब तो समझा था नहीं, आज हुए लाचार।। बहुत याद आता हमें, कल में उसका साथ। अपने भ्राता शीश पर, रोकर  फेरा  हाथ।। जीवन जीना है कठिन,   कहते हैं वे लोग। जो खुद ही फैला रहे, जन-जीवन में रोग।। जीवन जीना आपको, इसका रखिए ध्यान। क्यों कोई देगा भला, तव को सुखदा ज्ञान।। धीमा  चलते आप  हैं, मगर  नहीं  बैचैन। लक्ष्य दिख रहा सामने, कहें आपके नैन।। आखिर इतना तेज क्यों,  भाग रहे थे आप। या फिर  कोई  चाहते, आप  छुपाना पाप।। सोच समझ अब लीजिए, देना नहीं उधार। वरना करना आपको, कल नाहक तकरार।। चाहे  जितना  हम  कहें,    देना  नहीं  उधार। इसके बिन चलता कहाँ, जीवन मधुर बयार।। आप स्वयं ही देखिए,  कितना उचित विचार। तब  ही  निर्णय  कीजिए, देना  नहीं  उधार।।  बिन उधार चलता भला, आज कहाँ व्यापार। आज  इसी पर चल  रहा, रोजगार  आधार।। नहीं जरुरत आपको, आज खड़ा जो द्वार। सख्ती से  उसको कहें, देना  नहीं  उधार।। तू मम जीवन ज्योति है, और तुही संसार। ईश्वर अनुकंपा  बड़ी, बन  आई आधार।। ज्ञान ज्योति फैलाइए, शिक्षित हों सब लोग। उन्नति पथ पर राष्ट्र के, सबका उचित प्रयोग।। विश्व  विजेता  फिर  बने,    आज  तीसरी  बार। आठ मार्च छब्बीस का, सफल  हुआ  रविवार।। गर्वित हम सब हो रहे, बना विजेता देश। टीम इंडिया ने दिया, आज पुनः परिवेश।। निज कर्मों से बन गये, कितने लोग महान। फिर भी बहुतों को नहीं, रहा स्वयं का ज्ञान।। अपने मुँह से क्या कहें, कहना नहीं महान। ऐसा  करते  हैं  वही,  केवल मूर्ख बखान।। लोग स्वयं के देश को, कहते  सदा  महान। ऊँचा  इसका  भाल हो, चाहे  जाए  जान।। महँगाई का डर बढ़ा,    देख-देखकर युद्ध। विश्व  प्रार्थना कर रहा, एक आस है बुद्ध।। महँगाई  की  आड़  में, भूल  गए  ईमान। जनता को हैं लूटते, कहाँ छुपे भगवान।। सुरसा डायन की तरह, लीले खुशियाँ रोज। महँगाई  की  मार  से, बचना  राहें  खोज।। झूठ  बोलते  वे  सभी,      लोग  हुए  बेशर्म। जिनका अपना है नहीं, जीवित मानव धर्म।। जरा नहीं है शर्म क्या, भूले जो माँ-बाप। तुमसे अच्छे लोग वे, जो करते हैं पाप।। शरम नाम की चीज को, बेंच  खा रहे  आप। व्यर्थ दिखावा कर रहे,   ईश नाम का जाप।। झूठ  बोलते  शान  से,      नेता  बड़े  महान। जनता जब होती खफा, खा जाती पहचान।। परंपरा को ढो रहे,    हम सब सारे लोग। और कह रहे गर्व से, व्यर्थ पालना रोग।। नहीं पुरातन कह करें, आप सभी अपमान। पुरखों की ये परँपरा,  है  अपनी  पहचान।। मान   प्रतिष्ठा  के   लिए,      रहते   सब   बेचैन। कर्म-धर्म को भूलकर, करते तिकड़म दिन-रैन।। ईश्वर  इच्छा  के  बिना, क्या  होता है काम। मान-प्रतिष्ठा छोड़िए, खो तक जाता नाम।। व्यर्थ  भौंकना  छोड़िए, चाहे  जो  हों  आप। देश से बढ़कर कुछ नहीं, करते रहो विलाप।। प्राण  प्रतिष्ठा  बाद  से,  फैल  रहा  उत्कर्ष। दशरथ नंदन की कृपा, सत्य सनातन हर्ष।। सागर भी अब सह रहा, आज युद्ध की मार। सनकी पागल बन गये, मानवता  पर  भार।। सागर सा जिसका हृदय, जहर हो रहा आज। छिड़ा  हुआ  जो  युद्ध है, दुनिया जाने राज।। अपने-अपने  पक्ष  की, करते  हम‌ सब बात। देख रहे निज स्वार्थ का, खूब करें प्रतिघात।। कौन पक्ष में है खड़ा, इसका भी हो ध्यान। नहीं दिखाना है हमें, दंभ और अभिमान।। सदा संतुलित ही रखें, अपना आप विचार। बात तर्क के साथ में, मत विपक्ष तकरार।। जो  विपक्ष  में  सामने, उसका भी सम्मान। तर्क बुद्धि से कीजिए, रखना मान विधान।। जब तक मन मिलता नहीं, नाहक है सब खेल। कुंठा   ईर्ष्या   हृदय   में,    कैसे   होगा   मेल।। मन में बाँधे गाँठ हो, और कर रहे खेल। आप नहीं जब चाहते, कैसे होगा मेल।। सत्य जीतता है सदा, यदि मन में विश्वास। अपनों से होती बहुत, उसको इतनी आस।। संघर्षों  के  बाद  में, मिले सुखद परिणाम। सत्य जीतता है सदा, पर नाहक बदनाम।। सदा  सत्य की  जीत  हो, ऐसी  बनती  राह। निश्चित इक दिन झूठ का, होना ही है दाह।। सदा प्रीति का कीजिए, आप सभी सम्मान। वरना इक दिन आपका, होगा ही अपमान।। रिश्तों की इक डोर का, छोर प्रीति के साथ। जिनकी चाहत है खुशी,  पकड़े रहते हाथ।। अब  कोई  अपना  नहीं, रखो आप सब याद। चिंतित होते क्यों भला, जो करना फरियाद।। वो निज अंक में भर करे, ममता की बौछार। पर  मेरी  लाचारगी,  न   मुझ  पर चढ़े उधार।।  बच्चे  कुंठित  हो  रहे, देख  अंक  का खेल। पद समान के बाद भी, नहीं रहा जब मेल।। आज जिसे भी देखिए, अपने में ही मस्त। और एक दिन स्वयं ही, हो जाते हैं पस्त।। आज  जिसे  भी  देखिए, मुफ्त  बाँटता  ज्ञान। नहीं देखता जो कभी, कटा हुआ निज कान।। आज जिसे भी देखिए, दिखलाता है शान। जिसे पता भी है नहीं, मान और अपमान।। कालर ऊँची कर रहे, जिसको देखो आज। एक मात्र सिद्धांत का, केवल करते काज।। मर्यादा  को  भूलते,    जिसको  देखो  आज। मातु-पिता को भले ही, कुंठित करती लाज।। सुधीर श्रीवास्तव 


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