दोहा
दोहा
दोहा - कहें सुधीर कविराय ********** अंधे होकर स्वार्थ में, गिरे हुए हैं आप। प्रतिफल निश्चित भोगिए, यह मेरा अभिशाप।। आप भला क्यों मानते, औरों को नादान। समझ नहीं क्या पा रहे, मिला उसे वरदान।। निम्न सोच के साथ कब, हुआ लक्ष्य संधान। जीवन का भी जानिए, निश्चित कर्म विधान।। मानव अपने कर्म से, बनता सदा महान। सतत कर्म की साधना, उसकी हो पहचान।। नाहक नहीं बघारिए, व्यर्थ आपका ज्ञान। अपने मुँह मिट्ठू मियाँ, बनिए नहीं महान।। अधिकारों के नाम पर, होता बड़ा विवाद। नहीं किसी को अब रहा, कर्तव्यों की याद।। मातु-पिता का अब कहाँ, बच्चों पर अधिकार। उनके हिस्से आ रहा, बस केवल दुत्कार।। वही यहाॅं खुशहाल है, जिसे न कोई लोभ। कभी किसी भी हाल में, करे नहीं जो क्षोभ।। जो रहता संतुष्ट हैं, करता नहीं बवाल। झूठ-मूठ रोता नहीं, वही यहाँ खुशहाल।। प्रेम-प्यार सद्भाव का, पाठ पढ़ाए नित्य। वही आज खुशहाल है, जिसका ये आदित्य।। बिन उधार होता कहाँ, आज भला व्यापार। जिम्मेदारी आपकी, बना रहे व्यवहार।। यदि लें आप उधार तो, इतना रखिए ध्यान। देने वाले का कभी, मत करना अपमान।। हर कोई ऐसा नहीं, लायक इतना आज। जिससे खोलें हम सभी, अपने मन के राज।। अपने मन के राज को, रहो छिपाए आप। करने जो तुम जा रहे, बने नहीं अभिशाप।। श्रम से आप बनाइए, एक अदद पहचान। जाति - धर्म के खेल से, बनता कौन महान।। अपनी भी पहचान है, इसका हमको हर्ष। आ जायेगा एक दिन, जीवन में उत्कर्ष।। मानव जीवन जो मिला, ईश्वर का उपहार। प्यार सभी को चाहिए, बाँटो प्यार दुलार।। कभी आप भी सोचिए, सफल भला क्या जाप। प्यार सभी को चाहिए, फिर क्यों करना पाप।। शबरी राह निहारती, आयेंगे प्रभु राम। उसके जीवन का यही, एकमात्र आयाम।। राम प्रभो को देखकर, खोई शबरी होश। जूठे बेर खिला रही, मन में इतना जोश।। आशा देती है हमें, नित नूतन विश्वास। हार-जीत का नियम है, आज दूर कल पास।। छोड़ निराशा तो बढ़ो , करो भरोसा आप। नाहक इतना क्यों भरे, मन अपने संताप।। माँ गंगा तो आज भी, सहती हरदम त्रास। बे-कदरी निज देखती, फिर भी मन में आस।। नीति नियम को देखिए, सहती हरदम त्रास। मानवता नित रो रही, देख स्वयं का ह्रास।। अफवाहों में बढ़ रहा, तेल गैस का दाम। करें स्वार्थी लोग कुछ, देशद्रोह का काम।। तेल गैस के दाम की, चर्चा होती आम। सत्य झूठ के फेर में, बेगुनाह बदनाम।। आई संकट की घड़ी, आप बढ़ाएँ हाथ। सभी धैर्य के साथ में, चलें राष्ट्र के साथ।। बड़ी जरूरत आज की, सब मिल करिए काम। घटा मान यदि देश का, सब होंगे बदनाम।। भरे पड़े संसार में, ऋषि मुनि ज्ञानी संत। जब तक प्राणी है धरा, चर्चा सदा अनंत।। कमी नहीं संसार में, गुणी जनों का आज। बदनामी के बाद भी, शोभित होता ताज।। बिना कर्म के व्यर्थ है, अच्छे दिन की चाह। हाथ बाँध मिलता किसे, आप बताओ राह।। नहीं सिखाना चाहिए, चले गलत की राह। उल्टा होगा एक दिन, निकलेगा मुखआह।। हमें मिटाना चाहिए, कुंठित मन व्यवहार। प्रेम प्यार से सब रहें, करें नहीं तकरार।। करिए अपनी चाल में, अपने आप सुधार। और संग में चित्र भी, तब मोहे संसार।। चेहरा चुगली कर रहा, मन, वाणी, व्यवहार। चर्चा स्वयं बखानती, क्या चरित्र का सार।। छल-बल के इस दौर में, रहिए आप सतर्क। जितना संभव हो सके, रहिए दूर कुतर्क।। छल-छंदो का गूढ़ है, अजब-गजब विज्ञान। सबके अपने तर्क है, सबका अलग विधान।। नेता ऐसा चाहिए, करे सभी के काम। सेवा और संवेदना, सब जनता के नाम।। नेता ऐसा चाहिए, जिसकी ऐसी चाह। कार्य सदा ऐसा करे, हो जनता में उत्साह।। नेता ऐसा चाहिए, हो मिलना आसान। जिसके भीतर तनिक भी, नहीं स्वार्थ अभिमान।। नेता ऐसा चाहिए, करें नहीं जो भेद। भूल-चूक पर वो करे, क्षमा याचना खेद।। नेता ऐसा चाहिए, जिसका एक विचार। जनता भी जिसके लिए, लगे आप परिवार।। सेवक मिलना आजकल, अपवादों की बात। लोग स्वार्थ में आजकल, कहते दिन को रात।। दास प्रथा के दंश की, उठती अभी भी टीस । भले निकालें हम सभी, व्यर्थ मानकर खीस।। सब नौकर हैं जगत में, मान रहा है कौन। सत्य नहीं स्वीकारना, इसीलिए तो मौन।। चाकर बनने की रही, कितनों की अब चाह। चाटुकारिता में करें, दीन-धर्म सब स्याह।। किंकर बनिए गुरू का, दृष्टा बनकर आप। कर्ता बन वो स्वयं ही, हर लेंगे संताप।। राम कृपा जिस पर रही, दूत नाम हनुमान। यश -वैभव उसका बढ़ा, मिला मान-सम्मान।। ईश-कृपा यदि चाहिए, तो करिए विश्वास। सुख-समृद्धि संग में, तब पूरी हर आस।। वक्त साथ जो चल रहे, बुद्धिमान वे लोग। किस्मत उनके साथ है, लोग कहें संयोग।। वक्त सगा किसका हुआ, नाम बताओ आप। चलता अपनी चाल है, क्या ये उसका पाप।। अपनेपन के भाव का, होता जाता अंत। यूँ तो सब ही बन रहे, सभी बड़े ही संत।। आज किसी से व्यर्थ है, अपने पन की चाह। सभी ढूँढते इन दिनों, केवल स्वारथ राह।। अपने पन की चाह में, बोलें मीठे बोल। वाणी में रस घोलकर , हृदय जहर अनमोल।। शेर गाय थे सामने, क्यों होते हैरान। दोनों की ये सौम्यता, देती हमको ज्ञान।। दोनों ही निश्चिंत है, बिना किसी संदेह। मुखमंडल को देखिए, जैसे लगें विदेह।। बाबा मेरे देश में, भाँति-भाँति के लोग। आप हमें समझा रहे, ये केवल संयोग।। करें धर्म की आड़ में, उल्टे सीधे काम। डर जिनको लगता नहीं, होने बदनाम।। कोशिश कितनी हो चुकी, इन पर नहीं लगाम। बदनामी जिनके लिए, जस सुखदा आयाम।। आज चाहते हम सभी, गाड़ी बंगला कार। नीति नियम सिद्धांत से, करें नहीं हम प्यार।। बाबा बनकर देखिए, खुल जायेगा भाग्य। हम भी आपके साथ में, ले लेंगे वैराग्य।। होना सबसे चाहिए, समता का व्यवहार। संविधान की आड़ में,मत करिए तकरार।। समता के संदेश का, तभी सफल आयाम। जब चाहेंगे हम सभी, करना ऐसा काम।। धर्म जाति की ओट में, राजनीति का खेल। सत्ता कुर्सी के लिए, फैल रहा विषबेल।। समता के व्यवहार का, नित होता उपहास। सिर्फ दिखावे के लिए, होते कुटिल प्रयास।। पहले उसने प्यार से, लिया भरोसा जीत। चतुराई से फिर ठगा, बनकर मेरा मीत।। व्यर्थ आप लिखते रहे, सुंदर मोहक गीत। उसने धोखा संग में, लिया भरोसा जीत।। सब जानें हनुमान जी, महावीर बलवान। राम भक्ति थी हृदय में, तनिक नहीं अभिमान।। महावीर का एक था, पंचशील सिद्धांत। पाप-पुण्य की सीख का, संदेशा वेदांत।। रिश्ते भी अब रक्त के, देते गहरे घाव। जैसे लहरों बीच में, घिर जाती है नाव।। बूंद-बूंद के रक्त का, अमृत जैसा मोल। पड़े जरुरत जब कभी, समझ रहे तब तोल।। नहीं रक्त संबंध है, फिर भी होता प्यार। कुछ रिश्ते संसार में, ईश्वर का उपहार।। सुधीर श्रीवास्तव
