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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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चलो यूं ही सही

चलो यूं ही सही

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तुम हो, मैं हूं 

हमारे बीच एक पुल है

सम्विधान का,

सामाजिकता का,

मनुष्यता का।


तुमसे मिलने की जरूरत है

मिलने की कोशिशें हैं

हर बार पहुचता हूं तुम्हारे पास

अपनी जरूरत के सिलसिले में

याद दिलाते हूये अपने सम्बन्ध 

हर बार तुम अपने अस्तित्व को

इंकार करते हो


अपने से किसी को सामने करते हो या

तुम्हारे सामने तुम्हारा कोइ

हम सकल आता है

निगल जाता है

मुझे, मेरी जरूरतों के साथ

और तुम चहकते रहते हो


अपने होने को

भिन्न भिन्न आकर्षक रूपों में।

तुम्हारी सामाजिकता भीड़ बन जाती है

और तुम खो जाते हो भीड़ में।


चलो यूं ही सही

मेरी मनुष्यता तुम्हारे अस्तित्व  

को स्वीकार करते हुये

तुम्हें अपने होने की

अनुभूति कराने के लिये

 सक्रिय रहेगी।


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