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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Abstract

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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छोटी सी खुशी बनती कारवां

छोटी सी खुशी बनती कारवां

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जिन्दगी का मजा है खुलकर जीने में, 

लोग कहेंगे क्या, क्यूं सोचना है दिल में? 

बड़ी की चाहत में छोटी न कुर्बान करें,

चलो एक बार जीवन खुशी के नाम करे।


छोटे-छोटे लम्हों से लें जीने की खुशियां,

मन को कर ताजा थाम ले हाथ मुट्ठियां।

सहेज खुशियों को आज अभी भुना ले,

पता नहीं कल वे भी हमसे मुख मोड़ लें।


आंख मिचौली करती धूप ने था जगाया,

अलस भोर, पल को गुस्सा तेज था आया।

मैं हंसी, ओ! इसने तो वक्त पर है जगाया,

यही तो सरल खुशियां बंद न करे बारियां 

                

क्यूं खुशियों को महलों में खोजते हैं हम,

प्रकृति ने खुशियों के अवसर दिये कम?

खुशियां पलक-पांवड़े बिछा हंस रहीं थीं,

शायद मैं उन्हें छोटी समझ यूं खो रही थी 


कुछ जन-मन की, बातें सुनते-सुनाते चलें,

प्यार से गुनगुनाते गीत-गाते मुस्काते चलें

जो जैसा है उसी रूप में हम करें स्वीकार

जीवन हो खिला-खिला सुरभित मजेदार


भोर में खिलती कलियां, अनदेखी न करें,

समेट खुशियों को दामन अपने सजा लें।

आज जो मिला सुखद शायद कल न हो,

कल हो बहुत कुछ, हम ही चमन में न हों।


बारियां--खिड़कियां 

      



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