चाँद रात तुम और मैं
चाँद रात तुम और मैं
रोलीमय रात की पलकों तले
दरिया के साहिल पर ठंडी रेत की
सरसराहट तलवों को चूमती रवानी देती है
मेरे तन में बहते लहू में तुम्हारी
हथेलियों से बहती गर्माती उष्मा रोम-रोम को
छूकर प्रीत का आगाज़ देते छेड़ती है।
मंद बहती सननन करती
बयार मेरे गेसूओं को आहिस्ता से उठा कर
तुम्हारे चेहरे पर मल देती है !
रेशमी गेसूओं की संदली महक से
बहकते चाँदनी में नहाए मेरे तन पर तुम्हारा
शबनमी साया लिपटकर लेता है आलिंगन !
अधरों पर अधरों के स्पर्श से उभरी
मौन को चिरती एक सिसकी निकलकर
बैठ गई दो उर की दहलीज़ पर
धड़कन से एक शोर बहने
लगा मंद समीर संग खेलता !
एक आवारा बादल छा गया
चाँद के वजूद पर बनकर चद्दर चाहत की !
शबनमी गीली रात में बहती साँसों की
इलायची महक ने चाँद को भी
प्रणय रंग में बहा दिया !
आज बेहद खूबसूरत लग रहा है हर नज़ारा
रात, चाँद, तुम और मैं चल रहे है संग-संग.!
लो तारें शर्माते छुप गए आसमान के आँचल तले
देखकर मेरे तन को तुम्हारी आगोश में खेलते।
