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Prafulla Kumar Tripathi

Abstract

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Prafulla Kumar Tripathi

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चाहो तो

चाहो तो

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ज़िंदगी को

सड़क पर

लावारिस

फेंक दिया मैंने


चाहो तो

कुचल दो

चाहो तो

संभाल लो


एक गठरी

दर्द की

संजो लिया

है फिर से


चाहो तो

बाँट लो

चाहो तो

फेंक दो।


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