STORYMIRROR

संजय कुमार

Abstract

4  

संजय कुमार

Abstract

चाह हमारी।

चाह हमारी।

1 min
102

जिस तरह चांद है,चांदनी के लिए

है मेरी जिंदगी, बस तुम्हारे लिए


तुम मिले तो मुझे एक पल के लिए

फिर ये जीवन दुबारा नहीं चाहिए


है रुका चांद ये चांदनी के लिए

वर्ना तारों की महफ़िल नहीं चाहिए


नभ से वसुधा तक तुम्हीं तुम हो

और नजर नाए कोई दूजा मुझे।


आंचल में अपने रखलो हमें

बस चाह हमारी है, इतनी सी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract