बूढ़ा बरगद
बूढ़ा बरगद
एक बरगद का तना कभी घना हुआ करता था
इसके चारों ओर कलरव शोर रमा हुआ करता था
ऊपर रंग बिरंगे पंछी वर्षों तक निर्भय पनाह पाते
नीचे कुछ पल बैठ राही अनादि राह की थाह लगाते
कभी बंजारन टोली ठिठक जाता, आश्रय गाह देख
गांव ग्वाला गीत गाता नित दोपहरी, पशु छायन छेंक
कभी गांवन मनचले खेला करते टहनी टहनी बरगद के
कभी दांव लगाते स्वयं छिपते टहनी टहनी बरगद के
पास खड़े सैकड़ों पेड़, बरगद संग सुख दुख सहते
जीवन गीत लगता यहां जब पवन भी यहां से बहते
बरगद आज बूढ़ा हो चला वक्त के निर्मम आघात से
अपनी टहनी न कोई संगी रहा, ठूंठ बन खड़ा लाज से
नम आँखों से अपने ढूढ़ता, इस मेला भरे बाजार में
फिर कोई टहनी सुख टूट कहता रह मौत के कतार में
यह जीवन एक बरगद यारों, जीना है हमें हर हाल में
हरपल अपनों संग गुजारो, जाने कौन खो जाये काल में।
