STORYMIRROR

Sanjay Verma

Drama

3  

Sanjay Verma

Drama

बुढ़ापे की सनक

बुढ़ापे की सनक

1 min
238

जिंदगी का सच 

सुबह आईने में देखा 

खुद ही का चेहरा 

कितना बदल चूका 

मन के भाव आज जवान

चेहरे पड़ी झुर्रियां को 

ढांकने की कोशिश 


बालों को काला करके

युवाओं की होड़ में 

शामिल होने की

बुढ़ापे की सनक में 

थक चुके कई इंसान 


ऐसा लगता बुजुर्गी का 

मानो कोई इम्तिहान हो 

आवाज में कंपन

घुटनो में दर्द 

मानों सब खेल मुंह 

मोड़ चुके 

बतियाने को रह गया 

अनुभवों का खजाना 


और फ्लेस बैक यादों का 

आईने में अकेला निहारता चेहरा

और बुदबुदाता 

सभी को तो बूढ़ा होना ही 

एक न एक दिन 

युवा बात करे पल भर हमसे 


भागदौड़ की दुनिया से 

हटकर 

मन को सुकून 

मिल जायेगा

अकेले बतियाने और 

आईने में चेहरे को देखकर 

सोचता हूँ 

बुढ़ापा 

क्या ऐसा ही आता है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama