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Sweta Parekh

Abstract


4.0  

Sweta Parekh

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बस इतनी सी बात

बस इतनी सी बात

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कितना आसान होता ना अगर हम सीधी बात करते,

कितना आसान होता हर रिश्ता निभाना अगर हम बात की शुरुआत करते,

कितना आसान होता ना अगर हम बात करते,

फरियाद ही सही, मगर कुछ कहते,

स्वाभिमान और अभिमान के बीच काश हम कुच बोलते,

दिल की नाराजगी लफ्ज़ो में बया करते तो शायद गीले सिखवे भी ठहाको में जाहिर होते,

कितना आसान होता ना अगर हम बात करते!


मन ही मन में उलझते सवाल बयां हो पाते तो कहा बात थी,

समय के साथ शब्द भी जाहिर ना होते, अगर हम बेठ के वो अनकहे जज्बात समझ जाते,

वक़्त का क्या है इसकी तो फितरत है गुजरना, पर इस गुजरते वक़्त में कुछ लम्हे ढूढ़ इसे अपना बना पाते,

कितना आसान होता ना अगर हम समय निकाल पाते,


बस इतनी सी बात,

सीधी, सरल और साफ़ बस बात करना ही हर दर्द का इलाज

उलजते सुलझते जज्बातों को दिल खोल बयां करना है आज की आवाज!



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