STORYMIRROR

shaily Tripathi

Romance

4  

shaily Tripathi

Romance

बिरही बसंत

बिरही बसंत

1 min
341

जब याद तुम्हारी आती है

मन बिरहा से जल जाता है

मधुमय बसंत मेरे मन में 

इक अनबुझ प्यास जगाता है


वो दिन भी कैसे मादक थे

जब हम-तुम थे इक बस्ती में

दिन फूलों सा महका रहता

रातें कटती थीं मस्ती में


अब भी वह प्यारी बस्ती है

दिन है, शामें हैं और रात

तन सुलग रहा है बिन तेरे

बिरहन साँसों में सुस्ती है 


हैं तुम्हें पता सारी बातें 

फिर भी क्यों रार बढ़ाते हो 

महके-बहके इस मौसम में 

बेगाने बन तड़पाते हो ।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Romance