बरगद की छाँव
बरगद की छाँव
प्रदूषण और कोलाहल से भरे शहर, इनकी डगर ले चुके हैं भारत के गाँव ।
शहर तरस रहे गांवों को , अब गांव भी पाने को तरस रहे बरगद की छाँव ।
शहर जाने का प्रयास, भविष्य का दिखता प्रकाश, है विकास की भी आस।
बिगड़ चुके हैं हालात,लोभ की है सारी बात, उचित ही न हो पाते प्रयास।
चर्चा बहुत होती है, मगर निष्फल होती है , परिणाम कुछ मिलते न खास।
विघ्न तो सभी हरें ,त्याग दूसरे करें,अपनी बारी सोचकर होते जाते हैं उदास।
हो रहें हैं सब निराश ,अल्प हैं ये सब प्रयास , फैलते ही जा रहे इस समस्या के पाँव ।
अब गांव भी तरस रहे पाने को बरगद की छांव।
हो रहें हैं बेकरार, खोजेगी हल सरकार , सब हाथ पर धरे हैं हाथ।
हम अकेले क्या करें , प्रयास करने से डरें, चलेंगे गर मिले जो साथ।
गहन होती जाए रात , बदतर हो रहे हालात, हम बढ़ें थामने को हाथ।
हाल जाएंगे बदल, हर समस्या होगी हल, मिलकर जो हम बढ़ेंगे साथ।
गाँव होंगे फिर समृद्ध,बंद होंगे द्वन्द्व युद्ध, और बदल जाएंगे फिर से गाँव ।
अब नहीं तरसेंगे गाँव , पाने को बरगद की छांव।
