बरगद का पेड़
बरगद का पेड़
बरगद का वो पेड़
दादा जी के दादा ने लगाया था
मुझे दादा जी ने बताया था।
घंटों बैठते थे हम दोनों उसके नीचे
पके नीचे गिरे फल उठा कर खिलाते थे
हाज़मा ठीक रहेगा बताते थे।
हैरानी तो इस बात पर होती थी
इतना सा बीज और इतना विशाल वृक्ष
टहनियों से लटकती दाढ़ी ।
उसके हिस्सों से होने वाले उपचार
पत्तों को तोड़ने पर निकलने वाला दूध
हाथों में चिपचिपाहट आज भी महसूस है।
उसकी टहनियों पर लटकना मानों लम्बा होना
शुद्ध हवा में योगाभ्यास ,मानो तंदरूस्त होना
आज दादा जी नहीं ,पर यह बरगद मेरे दादा जी है।
लम्बी-लम्बी दाढ़ी जो धरती में समाई मानो आशीर्वाद
गाँव में कोई नहीं पर यह बरगद का पेड़ मेरा परिवार
कमी पूरी कर देता है पूर्वजों की ।
सब पर एक छत्रछाया सा यह विशाल पेड़
इसी बरगद में बसती मेरे पूर्वजों की आत्मा
मुझे मिलता अपूर्व सुकून ।
