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ritesh deo

Tragedy

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ritesh deo

Tragedy

बंधन

बंधन

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एक हृदय कितनें स्पंदन,

एक देह और कितने बंधन।

सबका हिस्सा बँट जाता है,

टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन।।


गर्भ बीज से अमरबेल बन,

तात,भ्रात,भगिनी संग बंधन।

खेल-खिलौने ,गुड्डे-गुड़िया,

सूना आँगन उड़ गयी चिड़िया।

आशा चौखट पर ठिठकी है,

दो आँखों में बस गया सावन।

टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन.....।।


शिशु कलियों के पायल कंगन,

घर -आँगन में करते गुंजन।

मृग छौने सी लिये चपलता,

उँगली पकड़ भरोसा चलता।।


 चूड़ी, कंगन ,माँग की लाली,

पैर महावर,रच गया आँगन।

 टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन......।।


किसी की इच्छा,किसी की खुशियांँ

सबकी अपनी -अपनी दुनियांँ।

लेते नेह निछावर हक से,

जब भी मिलते अपने पन से।।


 प्रेम भरी आँखों से देखो,

 सब कुछ दिखता निर्मल पावन।

 टुकड़े- टुकड़े बीते जीवन....।


अपनी -अपनी ओर खींचते,

एक साथ ही सारे बंधन।

दिखते न पर घाव छोड़ते,

अधिकारों के मूक प्रदर्शन।


 दिखे सरल पर कठिन बहुत है,

 पीड़ा और मुस्कान का संगम।

 टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन...।।


एक हृदय कितने स्पदंन,

एक देह और कितने बंधन।

सबका हिस्सा बँट जाता है,

टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन।।


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