बंधन
बंधन
एक हृदय कितनें स्पंदन,
एक देह और कितने बंधन।
सबका हिस्सा बँट जाता है,
टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन।।
गर्भ बीज से अमरबेल बन,
तात,भ्रात,भगिनी संग बंधन।
खेल-खिलौने ,गुड्डे-गुड़िया,
सूना आँगन उड़ गयी चिड़िया।
आशा चौखट पर ठिठकी है,
दो आँखों में बस गया सावन।
टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन.....।।
शिशु कलियों के पायल कंगन,
घर -आँगन में करते गुंजन।
मृग छौने सी लिये चपलता,
उँगली पकड़ भरोसा चलता।।
चूड़ी, कंगन ,माँग की लाली,
पैर महावर,रच गया आँगन।
टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन......।।
किसी की इच्छा,किसी की खुशियांँ
सबकी अपनी -अपनी दुनियांँ।
लेते नेह निछावर हक से,
जब भी मिलते अपने पन से।।
प्रेम भरी आँखों से देखो,
सब कुछ दिखता निर्मल पावन।
टुकड़े- टुकड़े बीते जीवन....।
अपनी -अपनी ओर खींचते,
एक साथ ही सारे बंधन।
दिखते न पर घाव छोड़ते,
अधिकारों के मूक प्रदर्शन।
दिखे सरल पर कठिन बहुत है,
पीड़ा और मुस्कान का संगम।
टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन...।।
एक हृदय कितने स्पदंन,
एक देह और कितने बंधन।
सबका हिस्सा बँट जाता है,
टुकड़े-टुकड़े बीते जीवन।।
