बिरह में राधा
बिरह में राधा
हमें तुम बहुत अच्छे लगते हो
यही मुझे समझा ने तो आई हूँ!
कहाँ गये वो दिन?
कहाँ गुम हुईं वो लम्बी रातें
तारे गिन-गिन रातें बिताते हो
अरे नटखट जरा देखो तो
तेरी राधा का क्या हाल हुआ
कहाँ हो? कब से बाट जोह रही हूँ
मुझे इतनी नादान मत समझ
रे निष्ठुर मैं तो तेरी दिवानी हो गई हूँ
आज मैं रो-रो के भी थक रे गई हूँ
अब ना देर कर ओ निर्मोही बैरी सांवरिया
सारे जग से मैं अब मैं हार गई हूँ
करु नमन् सभी गुणी जनों को,
सब छोड़ के मैं चली जाऊँ
वहीं जहाँ तेरी छवि मैं पाऊँ
जोहत जोहत आँखें धुंधली पड़ गई
सफेद हो गये केश- सारी उमरिया गई!
