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Mukesh Chand

Abstract

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Mukesh Chand

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बहुत हुआ अब चलते हैं

बहुत हुआ अब चलते हैं

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बहुत हुआ अब चलते हैं 

कही दूर निकालते हैं

जहाँ पर सिर्फ अपना राज हो.

ईष्या ओर क्रोध का ना साथ हो 

अपनो का हर समय 

सर पर हाथ हो। 


बहुत हुआ अब चलते हैं 

कहीं दूर निकालते हैं

ना कोई रोके ना कोई टोके 

हर खुशी मेरे साथ हो.

जीधर जाऊँ अपनों को पाऊँ 

उनसे हर रोज मुलाकत हो।


बहुत हुआ अब चलते हैं 

कहीं दूर निकालते हैं

अब की दुनिया की तरह 

ना बिखरे हुये जज्बात हो 

खुलकर कहु सब 

जो मेरे अंदर बात हो।


बहुत हुआ अब चलते हैं 

कही दूर निकालते हैं।

ज़िन्दगी का मकसद कुछ खास हो 

हर वक्त कुछ कर गुजरने की बात हो 

ज़िन्दगी जीने का सही एहसास हो 

हर एक लामहे मे मीठी सी बात हो।


बहुत हुआ अब चलते हैं 

कहीं दूर निकालते हैं।


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