भटक जाता हूँ उलझकर...
भटक जाता हूँ उलझकर...
उफ़नती दरिया में भी राहगीरों को राह दिखाया है मैंने।
मग़र! भटक जाता हूँ उलझकर तेरी गेसुओं की गहराई में।।
सुकूँ मिला मस्जिद के अजान में तो मन्दिर की शंखनाद में।
मग़र मिला नहीं वो सुकूँ जो सुकूँ मिला मुझे तेरी पनाह में।।
एक लापरवाह आदत हो गई है शोर को गले लगाने की।
मग़र! मैं आज भी खो जाता हूँ तेरी पायलों की झनकार में।।
इश्क़ - ए - इज़हार करूँ या इश्क़ -ए- इस्तिहार लिखूं तुझे।
कितनी मोहब्बत है तुझसे, ये बताना मुश्किल है शब्दों में।।
शरारतें करती हो नींद में गुदगुदी लगाकर तुम यूँ ही रातभर।
तुम हकीकत नहीं ख़्वाब हो मेरा, ये मैं मान लेता हूँ जहाँ में।।

