भोगी(स्वार्थी इंसान)
भोगी(स्वार्थी इंसान)
ये जो इंसान है,
उसे खुद पर कुछ ज्यादा ही अभिमान है,
ये घमंड में चूर रोज़ तोड़ देता है,
उस अदृश्य शक्ति के बनाए,
प्राकृतिक नियमों को,
रौंद देता है,
उसकी बनाई सर्वश्रेष्ठ कृतियों को,
अपने निज स्वार्थ के लिए,
जब की हर तिनके का अपना वजूद होता है,
और जीव उसको तो,
उस परम ब्रह्म ने
स्वयं ही निर्मित किया है,
अपने कर कमलों से,
अपने ही रचे बसाए ब्रह्माण्ड में,
स्वयं: के प्रयोजनों को सिद्ध करने,
और इंसान शक्ति के मद में चूर हो कर,
उस शक्ति को देता है "चुनौती",
उससे खुद के संबंध विच्छेद कर,
हालांकि इंसान विज्ञ है,
इस शक्ति के जुड़ाव से
जो बहुत गहरी है,पर
आंखों में प्रकृति पर अतिक्रमण,
और अपने शक्ति प्रदर्शन का,
चश्मा जो उसने लगाया है,
उससे उसका स्वार्थ,लालच
दिन प्रति दिन बढ़ता जाता है और
ये उसकी बुद्धि का हास कर,
उसे,प्राकृतिक शक्ति को
भोगने के लिए लालायित करता है,
और वो खुद अपने जीवन की
मर्यादाएं और सीमाएं तोड़ कर
बन जाता है- भोगी ।
