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Lakshman Jha

Abstract


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Lakshman Jha

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"भीड़ में रहकर भी हम अकेले रह गये"

"भीड़ में रहकर भी हम अकेले रह गये"

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फ़ेसबूक के पन्नों में भी हमारी मित्रता बढ्ने लगी !

अब कहाँ सीमित यहाँ क्षितिज के छोर को छूने लगी !!

हम ना सबको जानते हैं और ना उनको पहचानते हैं !

तस्वीर उनकी देखकर भंगिमाओं से उन्हें हम जानते हैं !!

दोस्त हम तो बन गये दीवारें भी खड़ी होती चलीं गईं !

ना कोई गुफ्तगू ना कोई पत्राचार बातें अपनी गुम हो गईं !!

टाइमलाइन में लिखने की शामत भला किसको आयी है !

यहाँ तो आउट ऑफ बाउड की तख्तियाँ लटकायी है !!

मेसेंजर में लाख अपनी बातें और व्यथाओं को लिख दें !

किसे फुर्सत है यहाँ पर आज कल गौर से ही इसे देख लें !!

मित्रता की भीड़ में हम इसतरह से अपने को तलाश किया !

लोगों के बीच पहुँच-पहुँच कर नए फिर से भरत- मिलाप किया !!


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