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Priyanka Tripathi

Tragedy

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Priyanka Tripathi

Tragedy

भारत की पहचान हिंदी

भारत की पहचान हिंदी

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एक ही नदी के दो किनारे,

हैं हिन्दी 'औ' संस्कृत।

मधुर रस लिए बहती कलकल,

हैं हिन्दी 'औ' संस्कृत।।

दोनो का हुआ मिलन,

भाषा सम्मेलन मे।

दोनो ने सुनाई आपबीती,

एक दूजे के गले लग के‌।।

संस्कृत बोली मै रह गई,

बनकर वेद पुराण की भाषा।

हिंदी बोली हां मै भी रह गई,

बनकर सिर्फ राज्यभाषा।।

संस्कृत ने ली गहरी सांस,

बोली पथराई आंखों से।

विद्वानों - गुणीजनो के ,

जुबान पर थी आसीन।।

देश था मेरा सोने की चिड़िया,

चमकती थी मां के ललाट पर।

कहीं खो गया मेरा वजूद,

सिमट कर रह गई किताब तक।।

संस्कृत की बातें सुनकर,

हिंदी की आंख भर आई।

ली उसने भी गहरी सांस,

दृवित मन से बोली।।

हूं मै देश की मातृभाषा,

मुझको ना कोई अपनाता।

सबका स्वाभिमान है घटता,

जब हिंदी बोलना पड़ता।।

देश का गौरव थी मै,

थी वीरों की आन-बान-शान।

मुझको माथे तिलक लगाकर,

खेल जाते अपनी जान पर।।

अंग्रेजी हम दोनों के बीच,

आ खड़ी हुई, दीवार बनकर।

खो रहा हमारा अस्तित्व,

कहीं सिमट न जाऊं,मैं भी किताब तक।।

आज हिंद का बच्चा-बच्चा,

हिंदी बोलने-सुनने से कतराता है।

अंग्रेजी बोलना अपनी शान समझता,

अंग्रेजी मे चलता-फिरता,अंग्रेजी मे खाता है।।

काश हिन्दवासी समझ पाते,

मातृभाषा का मान-सम्मान।

देश का गहना होती है भाषा,

भाषा से है राष्ट्र - सम्मान,

दोनो बता रही थी आपबीती,

जैसे सदियों बाद मिली हो दो बहनें।

नेत्रों मे भर - भर आते अश्रु,

जैसे जियरा का हाल सुना रही हो दो बहनें।।

खो दिया मैंने अपना वजूद,

पर तुम ना खोना हिंदी।

तुम हो राष्ट्र का स्वाभिमान हिंदी,

तुमसे है भारत की पहचान हिंदी।।



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