STORYMIRROR

Ruchika Rana

Abstract

4  

Ruchika Rana

Abstract

बेटियाँ

बेटियाँ

1 min
255

रेत के घरौंदे बनाते-बनाते, 

कब अपना घर बनाना सीख जाती हैं... 

पता ही नहीं चलता...ये बेटियाँ, 

कब बड़ी हो जाती हैं,

पता ही नहीं चलता! 

छोटी-छोटी खुशियों के लिए, 

आसमान सिर पर उठा लेती थी जो,

कब बड़े-बड़े दुख छिपाना सीख जाती हैं...

पता ही नहीं चलता... ये बेटियाँ, 

कब बड़ी हो जाती हैं,

पता ही नहीं चलता!!

        

        


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract