बेटियाँ...एक एहसास।
बेटियाँ...एक एहसास।
महकते पुष्पों सी खिलती हुई होती हैं बेटियाँ,
जिसके आने से सुगंधित हो उठती है बगिया,
अपनी परछाई में हमेशा उसकी एक झलक देखती हूँ,
जाने क्यों अपनी बेटी में मैं खुद को ढूंढती रहती हूँ,
मालूम है मुझे, किसी और घर की शोभा बढ़ाएगी,
अपनी मौजूदगी से दो दो कुलों को रोशन वो करेगी,
मेरी सुख-दुख की सखी वह मेरी बहुत परवाह करती है,
यह तन भले ही मेरा हो पर मेरी जान उस में बसती है,
सुना है बेटियाँ तब पैदा होती है जब प्रभु बहुत खुश होते है,
जिसकी हैसियत हो परियाँ पालने की प्रभु उसी को बेटी देते हैं,
मां बाप और बेटी के अटूट बंधन बहुत भावनात्मक होते हैं,
तभी तो अनजाने के हाथ जिगर का टुकड़ा सौंपते हुए वह बहुत रोते हैं,
अहोभाग्य वाले होते हैं जिनकी बगिया में गूंजती है किलकारियाँ,
सौभाग्यशाली होते हैं जिनके कुल में जन्म लेती है बेटियाँ।
