STORYMIRROR

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract

4  

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract

बेरोजगार और भिखारी

बेरोजगार और भिखारी

1 min
169

बेरोजगार और भिखारी

मैं ढूंढता हूँ रोटी

टूटे भिखारी सा

लेकिन


वह कूड़े की ढेर में और

मैं अखबार के पन्नो में

दोनों चलते हाथ फैलाये

वह टोकरी लिए

मैं डिग्री लिए


फिर भी

मैं बेरोजगार हूँ  भिखारी नहीं

रोटी चाहिए मुझे कृपादृष्टि नही

बदले में मेहनत दूंगा स्वाभिमान नहीं


कष्ट सहूँगा अपमान नहीं

राष्ट्र की जरूरत हूँ मैं

अर्थहीन जमात नहीं

जातिगत राजनीति तेरी


समाधान नहीं, समस्या है मेरी

बदलना होगा इस व्य्वस्था को

जिसमे भविष्य की आस्था नहीं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract