बदलाव
बदलाव
मुझ सा मुझ में कोई
बाकी ही नहीं अब
मैं आदत बदलता गया
और आदतें मुझ को
साथी तो बेशुमार हैं
बस कोई साथ नहीं
करनी ही नहीं आईं
हिफ़ाज़तें मुझ को
आते हुए सभी से
मिला भी नहीं
जाने कौन सी पड़ी थीं
आफ़तें मुझ को
गुज़ारिश जो की होती
क्या रुक ना गया होता
उनसे बढ़कर कब थे भला
रास्ते मुझ को
जिन्दगी मुझ से मेरे
गुनाह तमाम कहती गई
करनें न दीं मगर कभी
वकालतें मुझ को.
