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संजय असवाल "नूतन"

Abstract

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संजय असवाल "नूतन"

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बचपन

बचपन

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मां

मैं बच्चा ही रहना चाहता हूं 

तेरी गोद में जी भर 

सोना चाहता हूं।

मां जब तू मुझे 

अपना आंचल ओढ़ा देती है 

जीने की हर राह

मुझे सीखा देती है,

सच कहूं,

बचपन मेरा संवर जाता है 

ये जीवन 

सार्थक हो जाता है।


मां मैं बड़ा होने से बहुत घबराता हूं 

इस बचपन के 

खोने से डर जाता हूं 

इस दुनिया के छल कपट से 

खुद को इस भीड़ में खोने से 

स्वार्थ, लोभ, मोह, 

अहंकार में होने से  

मैं सहम जाता हूं,

मां मैं बड़ा होने से घबराता हूं।


मां बड़ा होने पर 

ये मासूम दिल 

पीछे कहीं छूट जाएगा 

बचपन की शरारतें, 

उछल कूद, मस्ती मजा

मिट्टी में खेलना,

दोस्तों संग गुल्ली डंडा

पापा की डांट,

मां तुझसे लिपटना,

तेरा प्यार और स्पर्श 

इन्हें छोड़ आगे बढ़ना 

मेरे लिए मुश्किल हो जाएगा 

बड़ा होने पर ये बचपन

पीछे कहीं छूट जाएगा,

इसलिए बड़ा होने से घबराता हूं,

मां,बच्चा ही रहना चाहता हूं।


मां, 

मेरे बचपन का नटखटपन 

शोर शराबा और उधम 

रोना चिल्लाना, 

पल में खिलखिलाना 

ये बेफिक्री फिर कहां से पाऊंगा

तेरे आंचल से दूर कहां जाऊंगा 

इसलिए बड़ा होने से घबराता हूं,

मां मैं बच्चा ही रहना चाहता हूं।

मां

तेरे आंचल को पकड़े चलना 

पल में गुस्सा, पल में लड़ना

सब बहुत याद आएगा

अपने बचपन की यादें 

दादी और नानी की कहानियां 

वो भोलापन,

वो अल्हड़पन, 

छोटी छोटी गलतियां 

वो सुखद मधुर जीवन 

बस यादों में रह जाएगा

मैं बड़ा हुआ तो सब 

पीछे छूट जाएगा,

इसलिए बड़ा होने से घबराता हूं,

बच्चा ही रहना चाहता हूं।

बचपन तू उम्र भर मुझे याद रहेगा 

जब तक आखिरी सांस इस तन में रहेगी 

तेरा फिर से इंतजार रहेगा 

मुझे हमेशा...!!!!



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