STORYMIRROR

Nirupa Kumari

Abstract

4  

Nirupa Kumari

Abstract

बचपन

बचपन

1 min
157

बहुत याद आती हैं वो यारियां

वो बचपन की शैतानियां

वो खेल खिलौने और

वो दादी नानी की कहानियां


वो पल में रूठना,पल में मान जाना

वो अमिया की बगिया,वो नीम का झूला

वो फिलपत्ती,वो रेत का टीला,दिल अब तक न भूला


ना चिंता न फिक्र,खुशियों भरा खेल खिलौनों का था सफ़र

बचपन के वो दिन जाने खो गए किधर


वो दिन भी क्या खूब थे,दुनियां के गमों से दूर

हम खेल खिलौनों में मसरूफ़ थे

काश! कि लौट पाते वो दिन, अब भी हैं हम

वो ही बचपन वाला सुकून दूंढते।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract